मैं एक् कलकार् हूँ

 

मैं एक् कलाकार् हूँ , सपना करता साकार् हूँ !

स्निग्ध् मन् की परिकल्पना का मैं अद्भुत् संसार् हूँ

मैं एक् कलाकार् हूँ !!

माथे की बिन्दिया बालों का गजरा ,

गले का हार् नैनों का कजरा ,

मैं यौवन् का उन्माद् ,जीवन् कि तरंग्,

मैं विदाई के आंसू,पावन् प्रणय की उमंग्,

अशलील् कोठों पर् नुपुरों की झ्ंकार् हूँ !

मैं एक् कलाकार् हूँ !!

मैं धरा का पावन् पुत्र वसुन्धरा का मान् ,

कटे सर् धड् से फ़ीकी पडे न शान्,

वैभव् राज् छोड् बना मैं राणा सा मानी,

निज् पुत्र् का दे जो दान् मैं पन्ना सा दानी ,

मैं धनुर्धर् अर्जुन् मैं गांडीव् की टंकार् हूँ !

मैं एक् कलाकार् हूँ !!

कोरे पन्नों पे लिखा मैं अमिट् इतिहास्,

मैं होंठों की ह्ंसी मैं जीवन् का परिहास्

मैं पिन्जरे का पन्छी मैं परिन्दे की परवाज़्,

वो तीन् लोक् का दाता मैं ब्रह्म् का आगाज़्,

मैं ओस् की बूँद् बरखा की फ़ुहार् हूँ

मैं नदी का पावन् नीर् मैं सागर् का सिंगार् हूँ !

मैं एक् कलाकार् हूँ ,सपना करता साकार् हूँ !!

स्निग्ध् मन् की परिकल्पना का मैं अद्भुत् संसार् हूँ !

मैं एक् कलाकार् हूँ !!

******धर्मेन्द्र कुमार् रविकुल्*****

 

 

 

वक्त की आवाज़

शहीदों के जिस्म पर लगेंगे कब तलक जख्म गहरे,
कब तक बैठे रहेंगे निर्वाक लगाए सोच पर पेहरे,
निर्दोश लहू आखिर कब तक शहीद कहलाएगा,
पाक की सरजमीं पर तिरंगा कब लहराएगा !!

आज़ाद घूम रहे दुश्मन दोस्तों के ही भेस में,
मुल्ला-उमर,लादेन जैसे पनप रहे आज के परिवेश में,
पह्चान ही गये हैं जब हम अपने दुश्मनों को तो,
विलम्ब क्यूं लग रहा समर बिगुल के आदेश में !

रावलपिन्डी में अब लहरा जाये पर्चम हिन्दुस्तान का,
नाम मिटा दो इस धरती से पापी पाकिस्तान का,
ईन्ट से ईन्ट बजा दो आज़ाद हिन्द के रखवालों,
है यही ऐलान आज हिन्द के हर नौजवान का !

निकाल लो उन आँखों को जो हमको घूर रहीं,
रावलपिन्डी और कराची अब नजरों से दूर नहीं,
भडक उट्ठी है ज्वाला अब खैर नहीं अतंकवाद की,
हम लें किसी का सहारा इतने हम मज़बूर नहीं !

वतन की आन पर प्रहरी मौत की नींद सो जाता है,
बरूदी होली खेल कर तिरंगे को गगन तक उठाता है,
अफ़सोस मगर रजनेताओं का चरित्र कितना बोना हो गया,
शहीदों के कफ़न से भी जहाँ का मन्त्रालय रिशवत खा जाता है !

या तो कह दो कि बाजुओं में हमारी दम नहीं,
वर्ना बता दो समुचे विश्व को कि हम किसी से कम नहीं,
होना है तो हो जाए एक बार युद्ध आर-पार का,
छीन लो उस धरती को जो ॒क्षॆत्र है हमारे अधिकार का !
****धर्मेन्द्र कुमार रविकुल”नाशाद”****

कवि रो रहा है

 कविता हंस रही है और कवि रो रहा है!
क्या होगा ऐसे देश की आवाम का,
जिसकी सरहद का सिपाही
सो रहा है !! 

भ्रस्टाचार कर रहा राज हुकुमरानों पर,
राजनेताऔं का चरित्र खो रहा है
देख ये मन्ज़र लाचार विधाता भी,
माँ भारती का दामन अश्कों से भिगो रहा है !
कविता हंस रही है और कवी रो रहा है!

  लाहौर वाला बर्बादी के सपने संजो रहा है
इस देश के टुकडे होने की बाट जोह रहा है,
इतने पर भी हम बेशर्मों की आँख का पानी नहीं जागा,
जबकि कशमीर की गलियौं में तिरंगा जलील हो रहा है !
कविता हंस रही है और कवी रो रहा है!

जगो ऎ हिदुस्तां वालों,वतन तुम्हरा नीलाम हो रहा है,
मुट्ठी भर सौदागरों की साजिश में,
आज़ाद हिंद फ़िर गुलाम हो रहा है !
कविता हंस रही है और कवि रो रहा है !

ऎ दोस्तों अब भी हो सके तो ज़मीर को जगाओ,
सोई धम्नियों के ठण्डे लहू में उबाल लाओ
बदलो उस बिके हुए इमान को जो,
वतन परस्ती को गद्दारी की माला में पिरो रहा है!
हो सके तो रोक लो उस मायूस कवि को जो,
अट्ठाहस लगाती कविता को आँसूओं से धो रहा है !
कविता हंस रही है और कवी रो रहा है!

****धर्मेन्द्र कुमार रविकुल”नाशाद”****

॑सृजन

भ्रष्ट समाज का उत्कर्ष करो !
जीवन है संघर्ष संघर्ष करो !!

मिटा डालो उग्रता के निशां,
बदल डालो भ्रमित समाज,
नींव बनो तुम युवा शक्ति,
जला डलो ये रिती रिवाज़ !

उखाड फ़ेंको उग्रवाद को,
बन जाओ तुम कर्णधार,
खोई मानवता को जगा लो,
हर इंसा करे पुकार !
खंण्डित कर दो उस समाज को,
जिसमे जलती कोई अबला हो,
ना हों जिसमें वर्ण विचार,
हर इन्सां बस इन्सां हो !

कसम है तुमको युवा शक्ति,
“॑सृजन”करो तुम समाज,
फिर बनो ॑कृष्ण कोई ,
अर्जुन बन जाओ तुम आज !

भ्रष्ट समाज का उत्कर्ष करो !
जीवन है संघर्ष संघर्ष करो !!
****धर्मेन्द्र कुमार् रविकुल् “नाशाद****

Read the rest of this entry »

दे कोई ज़ज़्बात

ढूंढता हूँ खुशियाँ जमाने भर के लिये !
कुछ तो समाँ कर लूं अपने घर के लिये !!

मुफ़लिसी से भी मै आराम पा जाता,
पास जो दाम होते ज़हर के लिये !

मर्तब उसके जमाने से जुदा हैं,
कुछ तो पास हो उसकी नज़र के लिये !

जीता है “नाशाद” मुर्दों की मनिन्द,
दे कोई ज़ज़्बात सुकून-ए-जिगर के लिये !

कफ़िर तलाश कतरे भी मयस्सर नहीं मुझको,
मौज-ए-दरिया कोई आये इस समंदर के लिये !

****धर्मेन्द्र कुमार रविकुल”नाशाद”****

उसके सुकुं के लिये

ताउम्र मैं उसका नाम करता रहा !
पर वो मुझको बदनाम करता रहा !!

इक अर्सा बीत गया मैंने सहर नहीं देखी,
मेरी हर सुबह को वो शाम करता रहा !

उसके सुकुं के लिये मैं जागा रातभर,
वो मेरी नींदें मगर हराम करता रहा !

किसी रिशते की वो ऎहमियत नहीं समझा,
जहाँ भी मिला पर मैं सलाम करता रहा !

****धर्मेन्द्र कुमर रविकुल”नाशाद”****

दिल की ज़मीं पर

दिल की ज़मीं पर

ShowLetter4

जज़्बातों को दिल के मैंने, तुमसे अभी कहा नहीं है !
नाम तेरा दिल की ज़मीं , पर मैंने अभी लिखा नहीं है !!

जज़्ब करे क्यूं रेत मेरे आंसुओं को ,
जख़्म दिल का मेरे अभी भरा नहीं है !

ख़्याल--दीदार बेकरार करता है ,
फल्सफ़ा--मुहब्बत तूने अभी पढा़ नहीं है !

मैं कैसे कह दूं कि वो शख़्स बेवफ़ा नहीं ,
मैंने चहरे को उसके अभी पढ़ा नहीं है !

तुझे क्या इल्म ज़िंदगी का नाशाद’ ,
तूने मुफ़लिसी को शायद अभी देखा नहीं है !

*******

धर्मेन्द्र कुमार रविकुलनाशाद’