दिल की ज़मीं पर

दिल की ज़मीं पर

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जज़्बातों को दिल के मैंने, तुमसे अभी कहा नहीं है !
नाम तेरा दिल की ज़मीं , पर मैंने अभी लिखा नहीं है !!

जज़्ब करे क्यूं रेत मेरे आंसुओं को ,
जख़्म दिल का मेरे अभी भरा नहीं है !

ख़्याल--दीदार बेकरार करता है ,
फल्सफ़ा--मुहब्बत तूने अभी पढा़ नहीं है !

मैं कैसे कह दूं कि वो शख़्स बेवफ़ा नहीं ,
मैंने चहरे को उसके अभी पढ़ा नहीं है !

तुझे क्या इल्म ज़िंदगी का नाशाद’ ,
तूने मुफ़लिसी को शायद अभी देखा नहीं है !

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धर्मेन्द्र कुमार रविकुलनाशाद’

 

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