दिल की ज़मीं पर
जज़्बातों को दिल के मैंने, तुमसे अभी कहा नहीं है !
नाम तेरा दिल की ज़मीं , पर मैंने अभी लिखा नहीं है !!
जज़्ब करे क्यूं रेत मेरे आंसुओं को ,
जख़्म दिल का मेरे अभी भरा नहीं है !
ख़्याल-ए-दीदार बेकरार करता है ,
फल्सफ़ा-ए-मुहब्बत तूने अभी पढा़ नहीं है !
मैं कैसे कह दूं कि वो शख़्स बेवफ़ा नहीं ,
मैंने चहरे को उसके अभी पढ़ा नहीं है !
तुझे क्या इल्म ज़िंदगी का ऐ ‘नाशाद’ ,
तूने मुफ़लिसी को शायद अभी देखा नहीं है !
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धर्मेन्द्र कुमार रविकुल ‘नाशाद’


