June 30, 2009 at 6:31 pm (कवितायें)
कविता हंस रही है और कवि रो रहा है!
क्या होगा ऐसे देश की आवाम का,
जिसकी सरहद का सिपाही सो रहा है !!
भ्रस्टाचार कर रहा राज हुकुमरानों पर,
राजनेताऔं का चरित्र खो रहा है
देख ये मन्ज़र लाचार विधाता भी,
माँ भारती का दामन अश्कों से भिगो रहा है !
कविता हंस रही है और कवी रो रहा है!
लाहौर वाला बर्बादी के सपने संजो रहा है
इस देश के टुकडे होने की बाट जोह रहा है,
इतने पर भी हम बेशर्मों की आँख का पानी नहीं जागा,
जबकि कशमीर की गलियौं में तिरंगा जलील हो रहा है !
कविता हंस रही है और कवी रो रहा है!
जगो ऎ हिदुस्तां वालों,वतन तुम्हरा नीलाम हो रहा है,
मुट्ठी भर सौदागरों की साजिश में,
आज़ाद हिंद फ़िर गुलाम हो रहा है !
कविता हंस रही है और कवि रो रहा है !
ऎ दोस्तों अब भी हो सके तो ज़मीर को जगाओ,
सोई धम्नियों के ठण्डे लहू में उबाल लाओ
बदलो उस बिके हुए इमान को जो,
वतन परस्ती को गद्दारी की माला में पिरो रहा है!
हो सके तो रोक लो उस मायूस कवि को जो,
अट्ठाहस लगाती कविता को आँसूओं से धो रहा है !
कविता हंस रही है और कवी रो रहा है!
****धर्मेन्द्र कुमार रविकुल”नाशाद”****
10 Comments
June 30, 2009 at 6:28 pm (कवितायें)
Tags: अर्जुन, इन्सां, उग्रवाद, उत्कर्ष, नींव, सृजन
भ्रष्ट समाज का उत्कर्ष करो !
जीवन है संघर्ष संघर्ष करो !!
मिटा डालो उग्रता के निशां,
बदल डालो भ्रमित समाज,
नींव बनो तुम युवा शक्ति,
जला डलो ये रिती रिवाज़ !
उखाड फ़ेंको उग्रवाद को,
बन जाओ तुम कर्णधार,
खोई मानवता को जगा लो,
हर इंसा करे पुकार !
खंण्डित कर दो उस समाज को,
जिसमे जलती कोई अबला हो,
ना हों जिसमें वर्ण विचार,
हर इन्सां बस इन्सां हो !
कसम है तुमको युवा शक्ति,
“॑सृजन”करो तुम समाज,
फिर बनो ॑कृष्ण कोई ,
अर्जुन बन जाओ तुम आज !
भ्रष्ट समाज का उत्कर्ष करो !
जीवन है संघर्ष संघर्ष करो !!
****धर्मेन्द्र कुमार् रविकुल् “नाशाद****
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June 30, 2009 at 6:24 pm (ग़ज़ल)
Tags: दाम, मनिन्द, मयस्सर, मर्तब, मुफ़लिसी, समंदर, ज़ज़्बात
ढूंढता हूँ खुशियाँ जमाने भर के लिये !
कुछ तो समाँ कर लूं अपने घर के लिये !!
मुफ़लिसी से भी मै आराम पा जाता,
पास जो दाम होते ज़हर के लिये !
मर्तब उसके जमाने से जुदा हैं,
कुछ तो पास हो उसकी नज़र के लिये !
जीता है “नाशाद” मुर्दों की मनिन्द,
दे कोई ज़ज़्बात सुकून-ए-जिगर के लिये !
कफ़िर तलाश कतरे भी मयस्सर नहीं मुझको,
मौज-ए-दरिया कोई आये इस समंदर के लिये !
****धर्मेन्द्र कुमार रविकुल”नाशाद”****
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June 30, 2009 at 6:02 pm (ग़ज़ल)
Tags: ताउम्र, बदनाम, रातभर, सलाम, सहर, हराम
ताउम्र मैं उसका नाम करता रहा !
पर वो मुझको बदनाम करता रहा !!
इक अर्सा बीत गया मैंने सहर नहीं देखी,
मेरी हर सुबह को वो शाम करता रहा !
उसके सुकुं के लिये मैं जागा रातभर,
वो मेरी नींदें मगर हराम करता रहा !
किसी रिशते की वो ऎहमियत नहीं समझा,
जहाँ भी मिला पर मैं सलाम करता रहा !
****धर्मेन्द्र कुमर रविकुल”नाशाद”****
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