कविता हंस रही है और कवि रो रहा है!
क्या होगा ऐसे देश की आवाम का,
जिसकी सरहद का सिपाही सो रहा है !!
भ्रस्टाचार कर रहा राज हुकुमरानों पर,
राजनेताऔं का चरित्र खो रहा है
देख ये मन्ज़र लाचार विधाता भी,
माँ भारती का दामन अश्कों से भिगो रहा है !
कविता हंस रही है और कवी रो रहा है!
लाहौर वाला बर्बादी के सपने संजो रहा है
इस देश के टुकडे होने की बाट जोह रहा है,
इतने पर भी हम बेशर्मों की आँख का पानी नहीं जागा,
जबकि कशमीर की गलियौं में तिरंगा जलील हो रहा है !
कविता हंस रही है और कवी रो रहा है!
जगो ऎ हिदुस्तां वालों,वतन तुम्हरा नीलाम हो रहा है,
मुट्ठी भर सौदागरों की साजिश में,
आज़ाद हिंद फ़िर गुलाम हो रहा है !
कविता हंस रही है और कवि रो रहा है !
ऎ दोस्तों अब भी हो सके तो ज़मीर को जगाओ,
सोई धम्नियों के ठण्डे लहू में उबाल लाओ
बदलो उस बिके हुए इमान को जो,
वतन परस्ती को गद्दारी की माला में पिरो रहा है!
हो सके तो रोक लो उस मायूस कवि को जो,
अट्ठाहस लगाती कविता को आँसूओं से धो रहा है !
कविता हंस रही है और कवी रो रहा है!
****धर्मेन्द्र कुमार रविकुल”नाशाद”****

