ताउम्र मैं उसका नाम करता रहा !
पर वो मुझको बदनाम करता रहा !!
इक अर्सा बीत गया मैंने सहर नहीं देखी,
मेरी हर सुबह को वो शाम करता रहा !
उसके सुकुं के लिये मैं जागा रातभर,
वो मेरी नींदें मगर हराम करता रहा !
किसी रिशते की वो ऎहमियत नहीं समझा,
जहाँ भी मिला पर मैं सलाम करता रहा !
****धर्मेन्द्र कुमर रविकुल”नाशाद”****

