कविता हंस रही है और कवि रो रहा है!
क्या होगा ऐसे देश की आवाम का,
जिसकी सरहद का सिपाही सो रहा है !!
भ्रस्टाचार कर रहा राज हुकुमरानों पर,
राजनेताऔं का चरित्र खो रहा है
देख ये मन्ज़र लाचार विधाता भी,
माँ भारती का दामन अश्कों से भिगो रहा है !
कविता हंस रही है और कवी रो रहा है!
लाहौर वाला बर्बादी के सपने संजो रहा है
इस देश के टुकडे होने की बाट जोह रहा है,
इतने पर भी हम बेशर्मों की आँख का पानी नहीं जागा,
जबकि कशमीर की गलियौं में तिरंगा जलील हो रहा है !
कविता हंस रही है और कवी रो रहा है!
जगो ऎ हिदुस्तां वालों,वतन तुम्हरा नीलाम हो रहा है,
मुट्ठी भर सौदागरों की साजिश में,
आज़ाद हिंद फ़िर गुलाम हो रहा है !
कविता हंस रही है और कवि रो रहा है !
ऎ दोस्तों अब भी हो सके तो ज़मीर को जगाओ,
सोई धम्नियों के ठण्डे लहू में उबाल लाओ
बदलो उस बिके हुए इमान को जो,
वतन परस्ती को गद्दारी की माला में पिरो रहा है!
हो सके तो रोक लो उस मायूस कवि को जो,
अट्ठाहस लगाती कविता को आँसूओं से धो रहा है !
कविता हंस रही है और कवी रो रहा है!
****धर्मेन्द्र कुमार रविकुल”नाशाद”****


dnaswa said,
जुलाई 7, 2009 at 2:11 अपराह्न
लाहौर वाला बर्बादी के सपने संजो रहा है
इस देश के टुकडे होने की बाट जोह रहा है
खूबसूरत रचना है…………. अच्छे भावों से सजाया है रचना को
albela khatri said,
जुलाई 7, 2009 at 5:10 अपराह्न
bahut umda rachna !
चन्दन कुमार झा said,
जुलाई 7, 2009 at 5:46 अपराह्न
बहुत ही सुन्दर रचना.देश को कर्मवीरो की जरूरत है.
चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है…….भविष्य के लिये ढेर सारी शुभकामनायें.
गुलमोहर का फूल
रवि कुमार, रावतभाटा said,
जुलाई 7, 2009 at 6:02 अपराह्न
बेहतर…
शुभकामनाएं
Vishawjeet said,
जुलाई 7, 2009 at 6:11 अपराह्न
Kafi achi deshbhakti poem aapne likhi hai.. or deshwashiyon ko desh ke baare main sochne ko mazboor kar deti hai…
meri kavita ‘Chamkega Hamara Hindustan’ yahan padiye http://poems.vishawjeet.in/2007/04/blog-post.html
govind goyal,sriganganagar said,
जुलाई 8, 2009 at 1:15 पूर्वाह्न
ati manbhavan.narayan narayan
Dr. Aditya Kumar said,
जुलाई 8, 2009 at 1:54 पूर्वाह्न
desh ki sthiti par satik vyangya kiya hai.
Rajendra said,
जुलाई 8, 2009 at 12:07 अपराह्न
हिंदी भाषा को इन्टरनेट जगत मे लोकप्रिय करने के लिए आपका साधुवाद |
meraj ahamad said,
जुलाई 9, 2009 at 4:05 पूर्वाह्न
नाशाद साहब बधाई!
आप भाषा के नये तेवर के साथ आये हैं।
संगीता पुरी said,
जुलाई 10, 2009 at 6:13 अपराह्न
बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्लाग जगत में स्वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।
Pavan kumar jain said,
अगस्त 2, 2009 at 3:08 अपराह्न
“dil ki zamin par baitha kavi jab rota hai.
unn ansuon se dhaar-a-kalam paini karta hai.
Apni kalam ko to talwar bana d aapne.”
Bai waah… kya khub rachana hai
“Mangalkamnayen”