दे कोई ज़ज़्बात

ढूंढता हूँ खुशियाँ जमाने भर के लिये !
कुछ तो समाँ कर लूं अपने घर के लिये !!

मुफ़लिसी से भी मै आराम पा जाता,
पास जो दाम होते ज़हर के लिये !

मर्तब उसके जमाने से जुदा हैं,
कुछ तो पास हो उसकी नज़र के लिये !

जीता है “नाशाद” मुर्दों की मनिन्द,
दे कोई ज़ज़्बात सुकून-ए-जिगर के लिये !

कफ़िर तलाश कतरे भी मयस्सर नहीं मुझको,
मौज-ए-दरिया कोई आये इस समंदर के लिये !

****धर्मेन्द्र कुमार रविकुल”नाशाद”****

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