मैं एक् कलकार् हूँ

 

मैं एक् कलाकार् हूँ , सपना करता साकार् हूँ !

स्निग्ध् मन् की परिकल्पना का मैं अद्भुत् संसार् हूँ

मैं एक् कलाकार् हूँ !!

माथे की बिन्दिया बालों का गजरा ,

गले का हार् नैनों का कजरा ,

मैं यौवन् का उन्माद् ,जीवन् कि तरंग्,

मैं विदाई के आंसू,पावन् प्रणय की उमंग्,

अशलील् कोठों पर् नुपुरों की झ्ंकार् हूँ !

मैं एक् कलाकार् हूँ !!

मैं धरा का पावन् पुत्र वसुन्धरा का मान् ,

कटे सर् धड् से फ़ीकी पडे न शान्,

वैभव् राज् छोड् बना मैं राणा सा मानी,

निज् पुत्र् का दे जो दान् मैं पन्ना सा दानी ,

मैं धनुर्धर् अर्जुन् मैं गांडीव् की टंकार् हूँ !

मैं एक् कलाकार् हूँ !!

कोरे पन्नों पे लिखा मैं अमिट् इतिहास्,

मैं होंठों की ह्ंसी मैं जीवन् का परिहास्

मैं पिन्जरे का पन्छी मैं परिन्दे की परवाज़्,

वो तीन् लोक् का दाता मैं ब्रह्म् का आगाज़्,

मैं ओस् की बूँद् बरखा की फ़ुहार् हूँ

मैं नदी का पावन् नीर् मैं सागर् का सिंगार् हूँ !

मैं एक् कलाकार् हूँ ,सपना करता साकार् हूँ !!

स्निग्ध् मन् की परिकल्पना का मैं अद्भुत् संसार् हूँ !

मैं एक् कलाकार् हूँ !!

******धर्मेन्द्र कुमार् रविकुल्*****

 

 

 

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