June 30, 2009 at 6:24 pm (ग़ज़ल)
Tags: दाम, मनिन्द, मयस्सर, मर्तब, मुफ़लिसी, समंदर, ज़ज़्बात
ढूंढता हूँ खुशियाँ जमाने भर के लिये !
कुछ तो समाँ कर लूं अपने घर के लिये !!
मुफ़लिसी से भी मै आराम पा जाता,
पास जो दाम होते ज़हर के लिये !
मर्तब उसके जमाने से जुदा हैं,
कुछ तो पास हो उसकी नज़र के लिये !
जीता है “नाशाद” मुर्दों की मनिन्द,
दे कोई ज़ज़्बात सुकून-ए-जिगर के लिये !
कफ़िर तलाश कतरे भी मयस्सर नहीं मुझको,
मौज-ए-दरिया कोई आये इस समंदर के लिये !
****धर्मेन्द्र कुमार रविकुल”नाशाद”****
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June 30, 2009 at 6:02 pm (ग़ज़ल)
Tags: ताउम्र, बदनाम, रातभर, सलाम, सहर, हराम
ताउम्र मैं उसका नाम करता रहा !
पर वो मुझको बदनाम करता रहा !!
इक अर्सा बीत गया मैंने सहर नहीं देखी,
मेरी हर सुबह को वो शाम करता रहा !
उसके सुकुं के लिये मैं जागा रातभर,
वो मेरी नींदें मगर हराम करता रहा !
किसी रिशते की वो ऎहमियत नहीं समझा,
जहाँ भी मिला पर मैं सलाम करता रहा !
****धर्मेन्द्र कुमर रविकुल”नाशाद”****
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May 25, 2009 at 5:38 pm (ग़ज़ल)
Tags: जख़्म, दिल, मुहब्बत, ज़मीं
दिल की ज़मीं पर

जज़्बातों को दिल के मैंने, तुमसे अभी कहा नहीं है !
नाम तेरा दिल की ज़मीं , पर मैंने अभी लिखा नहीं है !!
जज़्ब करे क्यूं रेत मेरे आंसुओं को ,
जख़्म दिल का मेरे अभी भरा नहीं है !
ख़्याल-ए-दीदार बेकरार करता है ,
फल्सफ़ा-ए-मुहब्बत तूने अभी पढा़ नहीं है !
मैं कैसे कह दूं कि वो शख़्स बेवफ़ा नहीं ,
मैंने चहरे को उसके अभी पढ़ा नहीं है !
तुझे क्या इल्म ज़िंदगी का ऐ ‘नाशाद’ ,
तूने मुफ़लिसी को शायद अभी देखा नहीं है !
*******
धर्मेन्द्र कुमार रविकुल ‘नाशाद’
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