दे कोई ज़ज़्बात

ढूंढता हूँ खुशियाँ जमाने भर के लिये !
कुछ तो समाँ कर लूं अपने घर के लिये !!

मुफ़लिसी से भी मै आराम पा जाता,
पास जो दाम होते ज़हर के लिये !

मर्तब उसके जमाने से जुदा हैं,
कुछ तो पास हो उसकी नज़र के लिये !

जीता है “नाशाद” मुर्दों की मनिन्द,
दे कोई ज़ज़्बात सुकून-ए-जिगर के लिये !

कफ़िर तलाश कतरे भी मयस्सर नहीं मुझको,
मौज-ए-दरिया कोई आये इस समंदर के लिये !

****धर्मेन्द्र कुमार रविकुल”नाशाद”****

उसके सुकुं के लिये

ताउम्र मैं उसका नाम करता रहा !
पर वो मुझको बदनाम करता रहा !!

इक अर्सा बीत गया मैंने सहर नहीं देखी,
मेरी हर सुबह को वो शाम करता रहा !

उसके सुकुं के लिये मैं जागा रातभर,
वो मेरी नींदें मगर हराम करता रहा !

किसी रिशते की वो ऎहमियत नहीं समझा,
जहाँ भी मिला पर मैं सलाम करता रहा !

****धर्मेन्द्र कुमर रविकुल”नाशाद”****

दिल की ज़मीं पर

दिल की ज़मीं पर

ShowLetter4

जज़्बातों को दिल के मैंने, तुमसे अभी कहा नहीं है !
नाम तेरा दिल की ज़मीं , पर मैंने अभी लिखा नहीं है !!

जज़्ब करे क्यूं रेत मेरे आंसुओं को ,
जख़्म दिल का मेरे अभी भरा नहीं है !

ख़्याल--दीदार बेकरार करता है ,
फल्सफ़ा--मुहब्बत तूने अभी पढा़ नहीं है !

मैं कैसे कह दूं कि वो शख़्स बेवफ़ा नहीं ,
मैंने चहरे को उसके अभी पढ़ा नहीं है !

तुझे क्या इल्म ज़िंदगी का नाशाद’ ,
तूने मुफ़लिसी को शायद अभी देखा नहीं है !

*******

धर्मेन्द्र कुमार रविकुलनाशाद’

 

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